उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo KHud na apne irade se bad-guman hota

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता

جو خود نہ اپنے ارادے سے بد گماں ہوتا

शायर: Aal-e-Raza Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता
क़दम उठाते ही मंज़िल पे कारवाँ होता

ये लुत्फ़ उन के तग़ाफ़ुल में फिर कहाँ होता
जो इक लतीफ़ तबस्सुम न दरमियाँ होता

खिले हैं फूल जो ऐसे में तुम चले आते
ये एहतिमाम-ए-बहाराँ न राएगाँ होता

दिमाग़ अर्श पे है जिस की धुन में वो सज्दा
मिरे नसीब में होता तो मैं कहाँ होता

समझ तो ये कि न समझे ख़ुद अपना रंग-ए-जुनूँ
मिज़ाज ये कि ज़माना मिज़ाज-दाँ होता

भरी बहार के दिन हैं ख़याल आ ही गया
उजड़ न जाता तो फूलों में आशियाँ होता

हसीन क़दमों से लिपटी हुई कशिश थी जहाँ
वहीं था दिल भी 'रज़ा' और दिल कहाँ होता