उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo bhi KHud-agahi samajhta hai

जो भी ख़ुद-आगही समझता है

جو بھی خود آگہی سمجھتا ہے

शायर: Vibha Jain 'Khwaab'7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो भी ख़ुद-आगही समझता है
मेरी बे-चेहरगी समझता है

सब समझते हैं खिलखिलाना मिरा
कोई संजीदगी समझता है

क़त्ल अफ़्सुर्दगी के हाथों हुए
पर जहाँ ख़ुद-कुशी समझता है

कब समझ आता है पराया ग़म
जिस पे गुज़रे वही समझता है

मैं दुख अपने सुनाती हूँ उस को
वो उन्हें शा'इरी समझता है

मैं कि कुछ और कहना चाहती हूँ
वो कि कुछ और ही समझता है

ज़िंदगी ख़्वाब है मुझे और वो
ख़्वाब को ज़िंदगी समझता है