उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis waqt raushni ka tasawwur muhaal tha

जिस वक़्त रौशनी का तसव्वुर मुहाल था

جس وقت روشنی کا تصور محال تھا

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस वक़्त रौशनी का तसव्वुर मुहाल था
उस शख़्स का चराग़ जलाना कमाल था

उस ने बिसात उलट दी मिरी एक चाल पर
मैं भी समझ गया जो उसे एहतिमाल था

रस्ता अलग बना ही लिया मैं ने साहबो
हर-चंद दाएरे से निकलना मुहाल था

अफ़्सोस अपनी जान का सौदा न कर सके
उस वक़्त क़ीमतों में बला का उछाल था

कुछ ग़ैब की सदाओं ने मुझ को किया निढाल
कुछ अपने ही सुकूत से मैं पाएमाल था

जिस रुत में वो मिला था उसी में जुदा हुआ
उस के विसाल-ओ-हिज्र में भी ए'तिदाल था