उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ko nasib iffat-e-qalb-o-nazar nahin

जिस को नसीब इफ़्फ़त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र नहीं

جس کو نصیب عف قلب و نظر نہیں

शायर: Sabir Abuhari8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस को नसीब इफ़्फ़त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र नहीं
आँखों में लाख नूर सही दीदा-वर नहीं

हुस्न-ए-तलब नहीं कहीं ज़ौक़-ए-नज़र नहीं
वर्ना वो आफ़्ताब कहाँ जल्वा-गर नहीं

माना कि तू है महरम-ए-राज़-ए-निहाँ मगर
अपनी ख़बर नहीं है तो कुछ भी ख़बर नहीं

मैं ख़ुद ही जज़्ब-ए-इश्क़ पे क़ाबू न रख सका
तुझ से तो कोई शिकवा मुझे चश्म-ए-तर नहीं

होते हैं बारयाब यहाँ सरफ़रोश ही
ये बारगाह-ए-इश्क़ है ख़ाला का घर नहीं

हुस्न-ए-नज़र अता हो तो हर ज़र्रा तूर है
कुछ भी हसीं नहीं है जो हुस्न-ए-नज़र नहीं

वो क्या गए कि इश्क़ की दुनिया उजड़ गई
दीवार-ओ-दर नहीं हैं वो शाम-ओ-सहर नहीं

सुन कर तिरे कलाम को वो हम-कलाम हों
'साबिर' तिरे कलाम में इतना असर नहीं