उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jhuk ke chalta hun ki qad uske barabar na lage

झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे

جھک کے چلتا ہوں کہ قد اس کے برابر نہ لگے

शायर: Umair Najmi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे
दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे

ये तिरे साथ त'अल्लुक़ का बड़ा फ़ाएदा है
आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे

नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे
ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे

माओं ने चूमना होते हैं बुरीदा-सर भी
उन से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे

ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है
इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे

ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर-सू
कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे

बाँझ फ़नकार है जिस पर कोई तन्क़ीद न हो
बे-समर होता है जिस पेड़ को पत्थर न लगे

तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं
कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे