उर्दू शायरी · ग़ज़ल

janab-e-shar ki kudurat ka ham-rikab hun main

जनाब-ए-शर की कुदूरत का हम-रिकाब हूँ मैं

جناب شر کی کدورت کا ہم رکاب ہوں میں

शायर: Daniyal Haider Jafri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जनाब-ए-शर की कुदूरत का हम-रिकाब हूँ मैं
ज़माना लाख कहे ठीक पर ख़राब हूँ मैं

मिरा वुजूद सरापा-ए-ख़ैर-ओ-शर तो नहीं
कहीं पे ख़ार कहीं शबनमी गुलाब हूँ मैं

जनाब-ए-शर के फ़ज़ाइल पे जो लिखी न गई
है मुख़्तसर सा ख़ुलासा वही किताब हूँ मैं

मुझे फ़क़ीर समझते हैं गर समझने दो
नज़र में माँ की तो बिगड़ा हुआ नवाब हूँ मैं

जो ख़ामुशी से नहीं आश्ना वो मुझ को पढ़ें
सुकूत-ए-हश्र पे लिक्खा गया निसाब हूँ मैं

मजाल किस की करे कोई हमसरी मेरी
ग़ुलाम-ए-हज़रत-ए-शाह-ए-अबू-तुराब हूँ मैं

ये इम्तिज़ाज मिरी शख़्सियत में है 'हैदर'
गुनाह जिस का सबब है वही सवाब हूँ मैं