उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jahan talak to meri zat ka talluq hai

जहाँ तलक तो मिरी ज़ात का त'अल्लुक़ है

جہاں تلک تو مری ذات کا تعلق ہے

शायर: Umair Najmi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जहाँ तलक तो मिरी ज़ात का त'अल्लुक़ है
तिरे सिवा ये जहाँ भर से ला-त'अल्लुक़ है

हमें इकट्ठे कभी देखना कहीं बैठे
नहीं है फिर भी लगेगा बड़ा त'अल्लुक़ है

मैं इस को तोड़ते अन्दर से टूट-फूट गया
मिरा ख़याल था कमज़ोर सा त'अल्लुक़ है

ख़ुशी के बारे में महदूद 'इल्म रखता हूँ
वो यूँ कि इस से मिरा दूर का त'अल्लुक़ है

हमारा रब्त त'आरुफ़ से मावरा है दोस्त
बता किसी को बताना पड़ा त'अल्लुक़ है

मैं क़त' करता नहीं सरसरी त'अल्लुक़ भी
तुम्हारे साथ तो अच्छा भला त'अल्लुक़ है

त'अल्लुक़ात कशीदा हैं आज-कल सब से
और इस की वज्ह तुम्हारा मिरा त'अल्लुक़ है

बना ही लूँगा त'अल्लुक़ मैं तुझ से जो भी हो
तू आज़मा ले जहाँ तक तिरा त'अल्लुक़ है

किसी के साथ बनाया तो फिर खुला मुझ पर
बराह-ए-रास्त त'अल्लुक़ भी क्या त'अल्लुक़ है