उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab the kam-umr samajhdar nahin hote the

जब थे कम-उम्र समझदार नहीं होते थे

جب تھے کم عمر سمجھ دار نہیں ہوتے تھے

शायर: Aarib Hashmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब थे कम-उम्र समझदार नहीं होते थे
उन दिनों लोग अदाकार नहीं होते थे

अब तो वो लोग भी मिलने को चले आते हैं
बात करने को जो तय्यार नहीं होते थे

कुछ घरों में कोई रहता ही नहीं था अफ़सोस
कुछ घरों के दर-ओ-दीवार नहीं होते थे

बात करने में कोई ख़ौफ़ नहीं होता था
लोग यूँ मिलने से बीमार नहीं होते थे

इस तरह फ़त्ह किए कितने इलाक़े हम ने
जंग के वास्ते हथियार नहीं होते थे

यूँ न हो आँख खुले और बिछड़ जाएँ हम
बस इसी ख़ौफ़ से बेदार नहीं होते थे

जिन दिनों ख़्वाब लुटाती थीं ये आँखें 'आरिब'
उन दिनों इतने ख़रीदार नहीं होते थे