उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab tak gham-e-habib se wabastagi rahi

जब तक ग़म-ए-हबीब से वाबस्तगी रही

جب تک غم حبیب سے وابستگی رہی

शायर: Zafar Mirzapuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब तक ग़म-ए-हबीब से वाबस्तगी रही
उल्फ़त की शाह-राह पे इक रौशनी रही

रुस्वाइयों के डर से कभी आह भी न की
इक आग थी जो दिल में हमारे दबी रही

परदेस में ब-वक़्त-ए-नज़' आया जब भी होश
मेरी निगाह ख़ाक-ए-वतन ढूँडती रही

ये उन से पूछिए कि ख़ुशी कैसी चीज़ है
जिन को नसीब कशमकश-ए-ज़िंदगी रही

ता'मीर-ए-ताज देख के कहती है हर निगाह
सदियाँ गुज़र गईं ये नई की नई रही

इक आशियाँ के जलसे से इतना तो हो गया
गुलशन में लम्हा भर तो 'ज़फ़र' रौशनी रही