उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab se ulfat ke zer-e-asar ho gai

जब से उल्फ़त के ज़ेर-ए-असर हो गई

جب سے الفت کے زیر اثر ہو گئی

शायर: Zafar Mirzapuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब से उल्फ़त के ज़ेर-ए-असर हो गई
ज़िंदगी मौत से बे-ख़बर हो गई

जब ग़ज़ल में कोई हुस्न आया नज़र
याद ताज़ा जनाब-ए-जिगर हो गई

पूछते हैं वो रुख़ की शिकन देख कर
ख़त्म कैसे ज़िया-ए-क़मर हो गई

सारे 'आलम को घेरे थीं तारीकियाँ
आप तशरीफ़ लाए सहर हो गई

शाख़ से टूटते ही ये क्या हो गया
फूल की ज़िंदगी मुख़्तसर हो गई

कोई ता'रीफ़ अच्छाइयों की नहीं
इक ख़ता पे जहाँ की नज़र हो गई

घर से निकले थे हम राहतें ढूँडने
दुख सर-ए-राह थी हम-सफ़र हो गई

ये वतन क्या बटा कितने इंसाँ बटे
एक बस्ती इधर की उधर हो गई

सादे काग़ज़ पे मेरा क़लम चल पड़ा
हर तख़य्युल बहार-ए-'ज़फ़र' हो गई