उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab bhi us husn-e-nazuki se milun

जब भी उस हुस्न-ए-नाज़ुकी से मिलूँ

جب بھی اس حسن نازکی سے ملوں

शायर: Nadeem Najid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब भी उस हुस्न-ए-नाज़ुकी से मिलूँ
इक 'अजब रंग-ए-रौशनी से मिलूँ

तू जो कह दे तो छोड़ दूँ ये जहाँ
तू जो कह दे तो हर किसी से मिलूँ

ख़ुद को इस वास्ते किया है चराग़
ताकि मैं अपनी रौशनी से मिलूँ

हर तरफ़ तू ही तू दिखाई दे
इस क़दर शौक़-ए-दिलबरी से मिलूँ

खोया जाऊँ मैं तेरे शहर में और
ढूँडने पर तिरी गली से मिलूँ

तुझ से पहले तिरी ख़ुशी के सबब
आँख में आ चुकी नमी से मिलूँ

इस क़दर भी मैं अब नशे में नहीं
तेरे होते भी ज़िंदगी से मिलूँ