उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bhul jaane ka hunar to mujhe aata hi nahin

भूल जाने का हुनर तो मुझे आता ही नहीं

بھول جانے کا ہنر تو مجھے آتا ہی نہیں

शायर: Nadeem Najid4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

भूल जाने का हुनर तो मुझे आता ही नहीं
इस लिए दूर तलक हिज्र से नाता ही नहीं

ऐसे दालान-कुशा के दर-ओ-दीवार पे ख़ाक
जो तिरे जिस्म की ख़ुशबू में नहाता ही नहीं

यूँ मयस्सर है हमें उन की जबीन-ए-रौशन
रात होने पे कोई दीप जलाता ही नहीं

इक 'अजब शहर-ए-मफ़ादात की ज़द में हैं सभी
अपने होने का यक़ीं कोई दिलाता ही नहीं