उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jao mujhe Darao na kar-e-malal se

जाओ मुझे डराओ न कार-ए-मलाल से

جاؤ مجھے ڈراؤ نہ کار ملال سے

शायर: Umair Najmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जाओ मुझे डराओ न कार-ए-मलाल से
ये काम कर रहा हूँ मैं बत्तीस साल से

पहले तो नाख़ुनों से तराशे कई पहाड़
फिर उस के बा'द ज़ख़्म कुरेदे कुदाल से

खुलती थी इक मकान की खिड़की जुनूबी सम्त
सूरज तुलूअ' होता था मेरा शुमाल से

ऐसा नहीं कि हिज्र हुआ मुझ में सिर्फ़ जज़्ब
ज़ाहिर भी हो रहा है मिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से

ये ज़ख़्म उस का आख़िरी तोहफ़ा है कुछ करो
कुछ भी करो बचाओ इसे इंदिमाल से

इक हिज्र-ए-मुमकिना मिरे काफ़ी क़रीब है
दीमक ज़रा सी दूर है लकड़ी के टाल से