उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is qadar Dar gae kuchh shorish-e-ayyam se log

इस क़दर डर गए कुछ शोरिश-ए-अय्याम से लोग

اس قدر ڈر گئے کچھ شورش ایام سے لوگ

शायर: Zaheer Ahmad10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस क़दर डर गए कुछ शोरिश-ए-अय्याम से लोग
अब तो बस घर से निकलते हैं किसी काम से लोग

इक ज़माना था कि ख़ुश-बाश नज़र आते थे
हर तरफ़ जादा-ए-दीरोज़ पे ख़ुश-गाम से लोग

शामिल-ए-क़ाल था इक हर्फ़-ए-तशक्कुर दिन रात
मुश्किलों में भी गुज़र करते थे आराम से लोग

हर तरफ़ सिक्का-ए-इख़लास-ओ-वफ़ा राइज था
सब को मिलते थे बराबर कई इन'आम से लोग

शामिल-ए-हाल बहर-हाल रहा करते थे
मिल के लड़ते थे कभी गर्दिश-ए-अय्याम से लोग

सच कहा करते थे ख़ाइफ़ न थे आईनों से
कम डरा करते थे अंदेशा-ए-अंजाम से लोग

इक तबस्सुम पे हुआ करते थे सौदे दिल के
दस्त-ए-उल्फ़त पे बिका करते थे बे-दाम से लोग

आँख में शर्म थी और दिल में हया होती थी
ख़ुद-नुमाई से बहुत दूर थे ज़र-फ़ाम से लोग

मिलने वालों से तिरे हम ने भी मिल कर देखा
बस वही 'आम सी बातें हैं वही 'आम से लोग

जाने क्यों तुम को 'अज़ीज़ इस क़दर आख़िर हैं 'ज़हीर'
टूटे फूटे से ये मजबूर से नाकाम से लोग