उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek badan mera talabgar hua jata hai

इक बदन मेरा तलबगार हुआ जाता है

اک بدن میرا طلب گار ہوا جاتا ہے

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक बदन मेरा तलबगार हुआ जाता है
और मिरी रूह को इंकार हुआ जाता है

मेरी कोशिश तो यही है कि ये मा'सूम रहे
और दिल है कि समझदार हुआ जाता है

अब तो इस शहर-ए-तमन्ना की फ़सीलें बाँधें
ये जो ता'मीर में मिस्मार हुआ जाता है

किस ने बोया है मिरी ख़ाक-ए-बदन में ख़ुद को
कौन ये मुझ में नुमूदार हुआ जाता है

इक नए रंज की आमद हो तो कुछ ध्यान हटे
अपने होने से हमें प्यार हुआ जाता है

सोगवारी की 'अलामत है सियाही जिस की
मुझ में उस रात का विस्तार हुआ जाता है