उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hujra-e-zat ki wahshat se sukun nikla hai

हुजरा-ए-ज़ात की वहशत से सुकूँ निकला है

حجرۂ ذات کی وحشت سے سکوں نکلا ہے

शायर: Aarib Hashmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुजरा-ए-ज़ात की वहशत से सुकूँ निकला है
अश्क निकला कि मिरा ज़ख़्म-ए-दरूँ निकला है

मैं अभी सर को पटख़ता हूँ यही सोचता हूँ
कैसे निकला तू मिरी ज़ात से क्यों निकला है

अब मैं जाना ये इनायात मिरे दोस्त की हैं
मैं समझता था मिरा बख़्त निगूँ निकला है

एक दीवार भी उठनी है अभी अपने बीच
इब्तिदा है ये अभी एक सुतूँ निकला है

सोचते सोचते वो दिल में हुआ तख़्त-नशीं
बोलते बोलते ही कुन-फ़यकूँ निकला है