उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hazaron Thokaren kha kar hain is darbar tak pahunche

हज़ारों ठोकरें खा कर हैं इस दरबार तक पहुँचे

ہزاروں ٹھوکریں کھا کر ہیں اس دربار تک پہنچے

शायर: Saadi Gilani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हज़ारों ठोकरें खा कर हैं इस दरबार तक पहुँचे
बड़ी मुश्किल से हैं हम इस गुल-ए-गुलज़ार तक पहुँचे

तिरी क़िस्मत में हैं वा'इज़ यही बातें यही क़िस्से
नहीं क़िस्मत तिरी तू जल्वा-गाह-ए-यार तक पहुँचे

बला से 'अर्श पर पहुँचे न पहुँचे ये फ़ुग़ाँ मेरी
इसे इतनी रसाई दे दयार-ए-यार तक पहुँचे

चले आओ दिगर-गूँ है मिरे अन्फ़ास का 'आलम
कि अब ये आख़िरी गिनती में हैं दो चार तक पहुँचे

नहीं आना अगर ख़ुद तो कोई पैग़ाम भिजवा दे
अरे कुछ तो दवा-दारू तिरे बीमार तक पहुँचे

मिला जब हश्र में हम को ख़ुदा के 'अर्श का साया
हुआ महसूस तेरे साया-ए-दीवार तक पहुँचे

अभी से होश तुम ने खो दिए और बात करते हो
अभी मुश्किल से 'सा'दी' थे ख़याल-ए-यार तक पहुँचे