उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chubhti rahi sine mein koi baat musalsal

चुभती रही सीने में कोई बात मुसलसल

چبھتی رہی سینے میں کوئی بات مسلسل

शायर: Saadi Gilani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चुभती रही सीने में कोई बात मुसलसल
पहलू ही बदलते रहे हम रात मुसलसल

होते हैं तसव्वुर में वो दिन रात मुसलसल
रहती है मिरी उन से मुलाक़ात मुसलसल

आग़ाज़ में हल्की सी चुभन दिल में थी नासेह
आहिस्ता से बढ़ती गई फिर बात मुसलसल

मुश्किल हुआ जाता है इसे पहलू में रखना
करने लगा दिल उन की शिकायात मुसलसल

मिल जाता ख़ुदा भी जो कभी ढूँडते उस को
जिस तरह से ढूँडा तुम्हें दिन रात मुसलसल

'सा'दी' हुआ दुश्वार मिरी जान का बचना
होने लगीं अब उन की 'इनायात मुसलसल