उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ashk baam-e-chashm par aane laga

अश्क बाम-ए-चश्म पर आने लगा

اشک بام چشم پر آنے لگا

शायर: Saadi Gilani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अश्क बाम-ए-चश्म पर आने लगा
राज़-ए-उल्फ़त बस कि खुल जाने लगा

कीजिए क्या उस बुत-ए-काफ़िर का जो
दिल में रह कर दिल को तड़पाने लगा

क्या कहें कितनी उमीदें बंध गईं
ज़ुल्फ़ के ख़म जब वो सुलझाने लगा

उस बुत-ए-नौ-ख़ेज़ की नैरंगियाँ
आइना भी जिस से शरमाने लगा

ज़ुल्फ़ जो सुलझा न सकता था कभी
गुत्थियाँ क़िस्मत की सुलझाने लगा

हश्र में भी उस की शोख़ी देखिए
मुझ को आता देख कर जाने लगा

'सा'दी' हो कैसे शब-ए-ग़म की सहर
दिल को मैं दिल मुझ को समझाने लगा