उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hawa ka shor agar kan mein nahin aata

हवा का शोर अगर कान में नहीं आता

ہوا کا شور اگر کان میں نہیں آتا

शायर: Balwan Singh Azar8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हवा का शोर अगर कान में नहीं आता
मैं इतनी दूर बयाबान में नहीं आता

मैं अपनी जीत से वाक़िफ़ अगर नहीं होता
अकेला हश्र के मैदान में नहीं आता

पुकारा था मिरे हम-ज़ाद ने मुझे वर्ना
अँधेरी रात में तूफ़ान में नहीं आता

कभी कभी तो उसे इतना सोच लेता हूँ
मिरा वुजूद मिरे ध्यान में नहीं आता

ख़बर नहीं थी मुझे कूज़ा-गर भी है सय्याद
वगरना जिस्म के ज़िंदान में नहीं आता

दुबारा आँख की जानिब उसे ले आता हूँ
वो दोस्त जो मिरी पहचान में नहीं आता

मिरे वुजूद में अब रात भी नहीं होती
सहर का ज़िक्र भी इम्कान में नहीं आता

किसी भी ज़ाविए से देख ले कोई 'आज़र'
फ़लक किसी के भी विज्दान में नहीं आता