उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hasraton ki rakh jab dil mein dabi rah jaegi

हसरतों की राख जब दिल में दबी रह जाएगी

حسرتوں کی راکھ جب دل میں دبی رہ جائے گی

शायर: Zafar Mirzapuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हसरतों की राख जब दिल में दबी रह जाएगी
बस कि होंटों पर भी मोहर-ए-ख़ामुशी रह जाएगी

सर्द-मेहरी का यही 'आलम रहा तो एक दिन
कैसा इख़्लास-ए-वफ़ा क्या दोस्ती रह जाएगी

ग़म का बादल तो नवाह-ए-जाँ में बरसेगा ज़रूर
ख़ुश्क चेहरा हो तो आँखों में नमी रह जाएगी

हर तरफ़ जाग उट्ठेंगे हंगामे और अपनी नज़र
पुर-सुकूँ कलियों का मंज़र ढूँडती रह जाएगी

आँधियाँ ले जाएँगी सब के घरों की बिजलियाँ
सिर्फ़ कुटिया में दिए की रौशनी रह जाएगी

अपनी आँखों पर ज़रा क़ाबू करो वर्ना 'ज़फ़र'
आँसुओं के घर में वो सूरत छुपी रह जाएगी