उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har wasile ko zamane se juda sochte hain

हर वसीले को ज़माने से जुदा सोचते हैं

ہر وسیلے کو زمانے سے جدا سوچتے ہیں (ردیف .. ے)

शायर: Elma Hashmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर वसीले को ज़माने से जुदा सोचते हैं
ये नई नस्ल के बच्चे हैं नया सोचते हैं

इतनी फ़ुर्सत ही नहीं देती ग़रीबी हम को
हम कहाँ कुछ भी कमाने के सिवा सोचते हैं

ये त'अल्लुक़ भी निभाते हैं तो ग़ैरों जैसा
मेरे अपने ही मिरा अब तो बुरा सोचते हैं

एक मुद्दत से क़ज़ा कर के नमाज़ें हम लोग
क्यों मुकम्मल ही नहीं होती दु'आ सोचते हैं

खा गया मेरी मोहब्बत को भी रुत्बा उन का
ख़ैर माँ बाप तो बच्चों का भला सोचते है