उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har shai ki bas tab tak qimat hoti hai

हर शय की बस तब तक क़ीमत होती है

ہر شے کی بس تب تک قیمت ہوتی ہے

शायर: Vibha Jain 'Khwaab'5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर शय की बस तब तक क़ीमत होती है
जब तक आप को उस की ज़रूरत होती है

दिल को हम ने समझाया था ख़ूब मगर
सोच-समझ कर कब ये मोहब्बत होती है

बे-शक वो कुछ लोग कमाल के होते हैं
जिन पे दुख की ख़ास इनायत होती है

रोना भी अब तो हम पर आसान नहीं
अश्कों को अब हम से वहशत होती है

अक्सर प्यार समझ लेते हैं लोग जिसे
प्यार नहीं होता है आदत होती है