उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek yaqin mabaada guman nikalne lage

हर इक यक़ीन मबादा गुमाँ निकलने लगे

ہر اک یقین مبادا گماں نکلنے لگے

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर इक यक़ीन मबादा गुमाँ निकलने लगे
ज़मीं खुदे तो फ़लक आठवाँ निकलने लगे

सपाट खेत हुआ करते थे यहाँ पहले
सड़क का बीज पड़ा तो मकाँ निकलने लगे

समय ने छेद किया हाफ़िज़े के पेंदे में
इक एक कर के सभी रफ़्तगाँ निकलने लगे

उसे दिखाना था इक ज़ख़्म उस का बख़्शा हुआ
जगह-जगह से रफ़ू के निशाँ निकलने लगे

समुंदरों के मुसाफ़िर उतर के जिन पे बसे
वो सब जज़ीरे भी आतिश-फ़िशाँ निकलने लगे

यूँही सुलगता रहा तो हर एक साँस के साथ
कोई ब'ईद नहीं है धुआँ निकलने लगे

निचोड़ लेता हूँ ख़ल्वत में आँखें वर्ना 'उमैर'
नमी का किस को पता कब कहाँ निकलने लगे