उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har gosha-e-chaman mein nawa-e-hazar hai

हर गोशा-ए-चमन में नवा-ए-हज़ार है

ہر گوشۂ چمن میں نوائے ہزار ہے

शायर: D. Raj Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर गोशा-ए-चमन में नवा-ए-हज़ार है
शायद कि आज आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार है

दाइम यहाँ ख़ुशी है न ग़म पाएदार है
फिर किस लिए जहाँ में बशर सोगवार है

वैसे तो ज़िंदगी से त'अल्लुक़ नहीं रहा
ज़िंदा हूँ इस लिए कि तिरा इंतिज़ार है

हैं उन के पास सारे ज़माने की ने'मतें
ले दे के मेरे पास दिल-ए-दाग़-दार है

मैं जानता हूँ अब वो न आएँगे लौट कर
वा'दे पर उन के फिर भी मुझे ए'तिबार है

लगता है अब क़रीब ही मंज़िल है दोस्तो
छाया हुआ फ़ज़ा में जो गर्द-ओ-ग़ुबार है

दा'वा तो कर रहे हैं सभी होश का 'कँवल'
देखो तो होश में भी कोई होशियार है