उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har dard ko mazi ki qasam bhul gae hain

हर दर्द को माज़ी की क़सम भूल गए हैं

ہر درد کو ماضی کی قسم بھول گئے ہیں

शायर: Danish Aligarhi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर दर्द को माज़ी की क़सम भूल गए हैं
हम तेरी ख़ुशी के लिए ग़म भूल गए हैं

फिर ऐ सितम-ईजाद कोई ताज़ा सितम कर
अब हम तिरा अंदाज़-ए-करम भूल गए हैं

जिस रोज़ से हम आए हैं मयख़ाने में साक़ी
उस दिन से रह-ए-दैर-ओ-हरम भूल गए हैं

ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-वफ़ा आप हैं लेकिन
इल्ज़ाम ये हम पर है कि हम भूल गए हैं

इल्ज़ाम किसे दें कि ये क़िस्मत का लिखा था
'दानिश' जो हमें अहल-ए-करम भूल गए हैं