उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamein tab tab rulati hai gharibi

हमें तब तब रुलाती है ग़रीबी

ہمیں تب تب رلاتی ہے غریبی

शायर: Lokesh Tripathi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमें तब तब रुलाती है ग़रीबी
कि जब जब याद आती है ग़रीबी

कभी मिटती नहीं है भूक इस की
ग़रीबों को ही खाती है ग़रीबी

ये इक अफ़्वाह फैलाई गई कि
हमेशा मुस्कुराती है ग़रीबी

छुपाएँ लाख पर्दों से इसे हम
यक़ीनन दिख ही जाती है ग़रीबी

किसी में और इतना दम नहीं है
हमें रुस्वा कराती है ग़रीबी