उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum jo kisi pahaD par apni dua utarte

हम जो किसी पहाड़ पर अपनी दु'आ उतारते

ہم جو کسی پہاڑ پر اپنی دعا اتارتے

शायर: Nadeem Ajmal Adeem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम जो किसी पहाड़ पर अपनी दु'आ उतारते
करते कलाम बा'द में पहले ख़ुदा उतारते

हम को दिया गया है जो हम पे तिरी 'अता है वो
हम भी इसी लिए नहीं बार-ए-ख़ता उतारते

कमरा महक उठा मिरा खुलने लगा वुजूद भी
आँखें चमकने लग गईं बाब-ए-वफ़ा उतारते

आना था आप ने अगर करते हमें तो कुछ ख़बर
आप की रह में हर तरफ़ बाद-ए-सबा उतारते

कितना वफ़ा-शि'आर था दर से मिरे नहीं उठा
रोते हुए गुज़ार दी रंग-ए-हिना उतारते

दीन पे जो नहीं थे लोग चाँद पे वो चले गए
हम तो रहे ज़मीन पर फ़तवे सदा उतारते

जिन पे बहुत ही नाज़ था दोस्त वही चले गए
इस से बड़ा 'अदीम' पर बोझ वो क्या उतारते