उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hai mazaq-e-zinda-dili yahi isi maslahat ne maza diya

है मज़ाक़-ए-ज़िंदा-दिली यही इसी मस्लहत ने मज़ा दिया

ہے مذاق زندہ دلی یہی اسی مصلحت نے مزا دیا

शायर: Aal-e-Raza Raza10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

है मज़ाक़-ए-ज़िंदा-दिली यही इसी मस्लहत ने मज़ा दिया
न जुदा हो दिल से कसक कभी वो मिज़ाज-ए-दर्द बना दिया

मैं अभी कहाँ था दिल-ए-हज़ीं जो खुली है आँख तो कुछ नहीं
मिरा फ़र्श-ए-ख़ाक तो है वहीं मुझे अर्श-ए-ख़्वाब ने क्या दिया

कोई हक़ था जिस का गिला करूँ कोई तुम से कहने की बात है
कि हँसी ख़ुशी के सुलूक का जो रिवाज था वो उठा दिया

मिरे दर्द-ए-दिल की किसे ख़बर कि ग़रीब-ए-दिल का पयाम्बर
वही रंग-ए-रुख़ था किसी क़दर जो हँसी में सब ने उड़ा दिया

है मुग़ालता भी अजीब शय वो न याद आएगा ता-ब-के
जो छुपा के अपने ही ज़ेहन में ये समझ लिया कि भुला दिया

रह-ओ-रस्म-ए-इश्क़ की मंज़िलें वो नज़ाकतें वो लताफ़तें
कभी लुत्फ़ आफ़त-ए-जाँ बना कभी झिड़कियों ने मज़ा दिया

वो तलव्वुन-ए-दम-ए-होश था कभी कुछ बने कभी कुछ बने
ये जुनून-ए-इश्क़ की शान है जो बना दिया सो बना दिया

ये चराग़ मेरी उमीद का ये घड़ी घड़ी तिरा मश्ग़ला
कभी दूर ही से जला दिया कभी पास आ के बुझा दिया

जो नज़र मिली तो ये सोच था कि सवाल आप से क्या करूँ
जो किया सवाल तो सोच है कि जवाब आप ने क्या दिया

है 'रज़ा' ये हस्ब-ए-मक़ाम-ए-दिल कि पयाम-ए-दिल हो ब-नाम-ए-दिल
कोई क़द्र-दान-ए-कलाम-ए-दिल कहीं मिल गया तो सुना दिया