उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghar se main dasht ki virani alag rakhta hun

घर से मैं दश्त की वीरानी अलग रखता हूँ

گھر سے میں دشت کی ویرانی الگ رکھتا ہوں

शायर: Balwan Singh Azar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घर से मैं दश्त की वीरानी अलग रखता हूँ
काम मुश्किल है ब-आसानी अलग रखता हूँ

तब मिरी ज़ात में कुछ भी नहीं होता है नुमू
अपनी इस ख़ाक से जब पानी अलग रखता हूँ

एक जैसे नहीं होते हैं यहाँ दो मंज़र
सुब्ह से शाम की हैरानी अलग रखता हूँ

है क़बा तेरी अलग मेरी क़बा से जैसे
तेरी 'उर्यानी से 'उर्यानी अलग रखता हूँ

मुझ को होती है तलब सिर्फ़ तिरे बोसे की
दूसरे होंठों से पेशानी अलग रखता हूँ

मेरी सुल्तानी तो दुनिया तिरे ही जैसी थी
हाँ मगर बे-सर-ओ-सामानी अलग रखता हूँ

यूँही दस्तक नहीं देती मिरे दर पर ता'बीर
ख़्वाब की तुम से निगहबानी अलग रखता हूँ

जिस्म की तीरगी है वो ही ज़माने वाली
मैं तो बस रूह की ताबानी अलग रखता हूँ

मुख़्तलिफ़ हैं मिरी ख़ुशियाँ भी किसी से 'आज़र'
ये भी सच है कि परेशानी अलग रखता हूँ