उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghazal ko fikr aisi do ki har mahfil taDap uTThe

ग़ज़ल को फ़िक्र ऐसी दो कि हर महफ़िल तड़प उट्ठे

غزل کو فکر ایسی دو کہ ہر محفل تڑپ اٹھے

शायर: Zafar Mirzapuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़ज़ल को फ़िक्र ऐसी दो कि हर महफ़िल तड़प उट्ठे
तिरे अश'आर सुन कर 'मीर' का भी दिल तड़प उट्ठे

ये आदाब-ए-सफ़र की दीन की ख़ूबी ज़रा देखो
अगर राही रुके रस्ते में तो मंज़िल तड़प उट्ठे

कभी कश्ती न डूबेगी अगर ऐसी मोहब्बत हो
इधर कश्ती भँवर में हो उधर साहिल तड़प उट्ठे

हमारी ज़िंदगी को भी मयस्सर वो मक़ाम आता
कभी माज़ी से मैं खेलूँ तो मुस्तक़बिल तड़प उट्ठे

तिरी भी फ़िक्र दुनिया से कुछ ऐसी बात कह जाए
कोई ज्ञानी तड़प उट्ठे कोई क़ाबिल तड़प उट्ठे

कुछ इस अंदाज़ से ये जान भी जाए तो बेहतर है
हमारे हौसलों के वार से क़ातिल तड़प उट्ठे

'ज़फ़र' समझूँगा मेरे शे'र की ये कामयाबी है
तिरे माथे की बिंदिया की अगर झिलमिल तड़प उट्ठे