उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gali se guzrun to us par bhi dhyan paDta hai

गली से गुज़रूँ तो उस पर भी ध्यान पड़ता है

گلی سے گزروں تو اس پر بھی دھیان پڑتا ہے

शायर: Danish Hayat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गली से गुज़रूँ तो उस पर भी ध्यान पड़ता है
वो जिस का घर मिरे रस्ते में आन पड़ता है

अब उस से आगे कोई शख़्स भी नहीं रहता
अब उस से आगे तो ख़ाली मकान पड़ता है

मैं रोज़ शब का अकेले 'अज़ाब सहता हूँ
बदन पे रोज़ ही ताज़ा निशान पड़ता है

हमारी राह में दीवार अब नहीं पड़ती
हमारी राह में अब आसमान पड़ता है

उस आइने में तिरा 'अक्स मुस्तक़िल है 'हयात'
वो आइना जो मिरे दरमियान पड़ता है