उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek hasrat hi rahi subh ke aaghaz ke sath

एक हसरत ही रही सुब्ह के आग़ाज़ के साथ

ایک حسرت ہی رہی صبح کے آغاز کے ساتھ

शायर: Danish Hayat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक हसरत ही रही सुब्ह के आग़ाज़ के साथ
वो मुझे रोज़ पुकारे नए अंदाज़ के साथ

मैं तिरे ऐसे पलटने पे यही सोचता हूँ
क्या ज़माने भी पलट सकते हैं आवाज़ के साथ

कुछ तो बोल ऐ मिरी ख़ामोश तबी'अत वाले
कितनी तकरार किया करता था नाराज़ के साथ

उस के क़दमों में रखी जाएगी तलवार मिरी
मुझ को अंजाम बताया मिरे आग़ाज़ के साथ

कितने अश्कों का त'अल्लुक़ है मिरी वहशत से
कितने ज़ख़्मों का त'अल्लुक़ तिरी आवाज़ के साथ

एक आवाज़ है आवाज़ भी सरगोशी की
और तो कोई नहीं है तिरे हमराज़ के साथ

अब वही शख़्स बता सकता है मुझ को 'दानिश'
किस क़दर गहरे मरासिम हैं सुख़न-साज़ के साथ