उर्दू शायरी · ग़ज़ल

diye ki aaKHiri KHwahish ka ehtiram karo

दिए की आख़िरी ख़्वाहिश का एहतिराम करो

دیے کی آخری خواہش کا احترام کرو

शायर: Danish Hayat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिए की आख़िरी ख़्वाहिश का एहतिराम करो
तमाम शहर जलाने का एहतिमाम करो

वुजूद चुप की तरफ़ गामज़न है और मुझे
ये लोग बोल रहे हैं कोई कलाम करो

कोई तो लफ़्ज़ तराशो हमारी हुर्मत पर
कोई तो संग हमारे सरों के नाम करो

मैं थक चुका हूँ क़दम से क़दम मिलाते हुए
रुको भी क़ाफ़िले वालो कहीं क़ियाम करो

ये ख़्वाब-ए-हिज्र ये वहशत ये दुख ये अश्क-ए-रवाँ
क़ुबूल कर लो इन्हें या फिर इंतिज़ाम करो