उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek hi naqsh hai jitna bhi jahan rah jae

एक ही नक़्श है जितना भी जहाँ रह जाए

ایک ہی نقش ہے جتنا بھی جہاں رہ جائے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शीर्षक की यह संग्रह प्रविष्टि 2 है। समान शीर्षक के रिकॉर्ड में पाठ या श्रेय का अंतर है; इसे स्वतंत्र आधिकारिक संस्करण का दावा न मानें। अन्य संग्रह प्रविष्टि 1

एक ही नक़्श है जितना भी जहाँ रह जाए
आग उड़ती फिरे हर-सू कि धुआँ रह जाए

कुछ ग़रज़ इस से नहीं रिज़्क़-ए-गदा हो कि न हो
कूचा-ओ-राह में आवाज़-ए-सगाँ रह जाए

ये सफ़र वो है कि इतना भी ग़नीमत है अगर
अपने हम-राह यही ख़ाक रवाँ रह जाए

और कुछ रोज़ रुके सुस्त लहू का मौसम
और कुछ देर यही रंग-ए-ख़िज़ाँ रह जाए

आज कल उस की तरह हम भी हैं ख़ाली ख़ाली
एक दो दिन उसे कहियो कि यहाँ रह जाए

कुछ तो रह जाए तग-ओ-ताज़ तलब में बाक़ी
वहम अपना रहे या उस का गुमाँ रह जाए

वो तमन्ना हूँ कि दिल से न गुज़र हो जिस का
वो तमाशा हूँ कि नज़रों से निहाँ रह जाए

ये भी इक मरहला-ए-सख़्त है ऐ साहब-ए-तर्ज़
कि बयाँ की जगह अंदाज़-ए-बयाँ रह जाए

नाम तो फिर भी बड़ी बात है दुनिया में 'ज़फ़र'
ये भी क्या कम है जो कुछ अपना निशाँ रह जाए