उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aasar-e-ab sail-e-sada ranj-e-raegan

आसार-ए-आब सैल-ए-सदा रंज-ए-राएगाँ

آثار آب سیل صدا رنج رائیگاں

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आसार-ए-आब सैल-ए-सदा रंज-ए-राएगाँ
क्या क्या हुआ की ज़द पे लरज़ता है बादबाँ

पानी पे काँपता है कोई पारा पारा 'अक्स
पत्थर को चाटता है कोई नक़्श-ए-बे-निशाँ

जैसे गुल-ए-स्याह बिखरता हो 'अर्श पर
गिरती हैं आसमाँ से अँधेरे की पत्तियाँ

किस दश्त-ए-बे-कनार में तन्हा खड़ा हूँ मैं
सारे बदन में रेत की लहरें सी हैं दवाँ

अब मैं नहीं तो मेरे सिवा सब सफ़र में हैं
सुनता हूँ अब्र से दिल-ए-दरिया की दास्ताँ

मौज-ए-हवस उभर के वहीं रह गई 'ज़फ़र'
दीवार-ए-दोस्ती थी मिरे उस के दरमियाँ