उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aasman ki KHak par jaise sitara shor hai

आसमाँ की ख़ाक पर जैसे सितारा शोर है

آسماں کی خاک پر جیسے ستارہ شور ہے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आसमाँ की ख़ाक पर जैसे सितारा शोर है
दिल के अन्दर फिर कई दिन से तुम्हारा शोर है

इस ज़मीं के साथ जिस की कोई निस्बत ही नहीं
जाने किन किन आसमानों से उतारा शोर है

अब तो मेरा भी नहीं चलता है इस पर इख़्तियार
जिस तरफ़ से बंद करता हूँ दुबारा शोर है

मेरे बाहर और अन्दर की तलाशी हो अगर
और ये कुछ भी नहीं सारे का सारा शोर है

देखता जाता हूँ सब कुछ और मेरे सामने
टुकड़े टुकड़े शाम है और पारा पारा शोर है

चल नहीं सकता हूँ और उस तक पहुँचना है ज़रूर
सुन नहीं सकता हूँ और उस का इशारा शोर है

ये जो हंगामा बपा है अपने अन्दर ऐ 'ज़फ़र'
कुछ हमारी शा'इरी है कुछ हमारा शोर है