उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab ke us bazm mein kuchh apna pata bhi dena

अब के उस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना

اب کے اس بزم میں کچھ اپنا پتہ بھی دینا

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब के उस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना
पाँव पर पाँव जो रखना तो दबा भी देना

यूँही अंजान बना रहता है दिल का अहवाल
लाख ज़ाहिर भी हो चेहरे से सुना भी देना

शब-ए-इंकार है और रौशनी-ए-शो'ला-ए-दिल
ढब पे आ जाए तो ये शम' बुझा भी देना

आ निकलता है इधर भी सो ग़नीमत है बहुत
वहाँ जाने का गिला तो उसे क्या भी देना

उस की ताईद तो करनी ही पड़ेगी आख़िर
मुँह से जो कुछ भी कहो हाथ उठा भी देना

दिल कहाँ है कभी इस शय का लगाना भी सुराग़
हाथ लग जाए तो ये ख़ाक उड़ा भी देना

इतने चेहरों में उसे ढूँढ ही लेते यूँ भी
क्या ज़रूरी था 'ज़फ़र' उस को सदा भी देना