उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aag do din mein ho gai ThanDi

आग दो दिन में हो गई ठंडी

آگ دو دن میں ہو گئی ٹھنڈی

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आग दो दिन में हो गई ठंडी
हज़रत-ए-दिल दिखा गए झंडी

दो क़दम भी चला नहीं जाता
निकली है दिल के पाँव पर चंडी

यूँ सजी है फटी पुरानी उमीद
शाम के वक़्त जिस तरह रंडी

वापस आने की राह कोई नहीं
जाती है शह्र को यही डंडी

ख़ल्वत-ए-ख़ास में पड़ा है वहाँ
एक से एक बढ़ के पाखंडी

क़ैद है इन कबूतरों के लिए
ये धंसी और फँसी हुई बंडी

सींग तो काफ़ी ख़ूबसूरत हैं
दुम ज़रा शा'इरी की है लंडी

लाख बच कर चलो 'ज़फ़र' उस से
ले मरेगी तुम्हें वो मुश्टंडी