उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek hi naqsh hai jitna bhi jahan rah jae

एक ही नक़्श है जितना भी जहाँ रह जाए

ایک ہی نقش ہے جتنا بھی جہاں رہ جائے

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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एक ही नक़्श है जितना भी जहाँ रह जाए
आग उड़ती फिरे हर-सू कि धुआँ रह जाए

ये सफ़र वो है कि इतना भी ग़नीमत है अगर
अपने हम-राह यही ख़ाक-ए-रवाँ रह जाए

और कुछ रोज़ रुके सुस्त लहू का मौसम
और कुछ देर यही रंग-ए-ख़िज़ाँ रह जाए

आज कल उस की तरह हम भी हैं ख़ाली ख़ाली
एक दो दिन उसे कहियो कि यहाँ रह जाए

वो तमन्ना हूँ कि दिल से न गुज़र हो जिस का
वो तमाशा हूँ कि नज़रों से निहाँ रह जाए

नाम तो फिर भी बड़ी बात है दुनिया में 'ज़फ़र'
ये भी क्या कम है जो कुछ अपना निशाँ रह जाए