उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek hi jast mein par jaun

एक ही जस्त में पार जाऊँ

ایک ہی جست میں پار جاؤں

शायर: Vikas Sharma Raaz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक ही जस्त में पार जाऊँ
कौन-सा पाँव पहले उठाऊँ

ज़ात कैसे तवाज़ुन में आए
सोच में हूँ कि क्या-क्या घटाऊँ

एक दिन तज्रबा कर के देखूँ
एक दिन यूँ करूँ घर न जाऊँ

सोगवारों का आहंग तोड़ूँ
बीच गिर्ये के मैं क़हक़हाऊँ

फेंक दूँ सब दवाएँ उठा कर
मौत के काम को क्यों बढ़ाऊँ

इक किरन रौज़न-ए-शब से आए
और मैं सुब्ह तक जगमगाऊँ

लग़्ज़िश-ए-पा ने सब कह दिया है
पहने हैं उस ने किस के खड़ाऊँ