उर्दू शायरी · ग़ज़ल

do ghaDi baiTh mere yar kahan jata hai

दो घड़ी बैठ मिरे यार कहाँ जाता है

دو گھڑی بیٹھ مرے یار کہاں جاتا ہے

शायर: Vikas Sharma Raaz8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दो घड़ी बैठ मिरे यार कहाँ जाता है
मुझ को तुझ से है सरोकार कहाँ जाता है

बाँध कर पाँव से रफ़्तार कहाँ जाता है
बहते पानी में ये कोहसार कहाँ जाता है

ख़्वाब की मस्ती हमें खींचे लिए जाती है
उस गली में कोई बेदार कहाँ जाता है

धूप-बर-दोश मुझे देख के इस रस्ते पर
पूछती है सफ़-ए-अशजार कहाँ जाता है

ये जो पैकर है मिरा जा-ए-अमाँ है तेरी
आ पलट आ मिरे पिंदार कहाँ जाता है

जब कहानी से निकल जाता है किरदार कोई
किसे मा'लूम वो किरदार कहाँ जाता है

माँद दिल की इसे इक बार नज़र आ जाए
फिर ये तन्हाई का ख़ूँ-ख़्वार कहाँ जाता है

हाँ यही बस्ती है हम चाक-गरेबानों की
आ यहाँ बैठ रफ़ू-कार कहाँ जाता है