उर्दू शायरी · ग़ज़ल

din utarte hi nai sham pahan leta hun

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ

دن اترتے ہی نئی شام پہن لیتا ہوں

शायर: Faiz Khalilabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ
मैं तिरी यादों का एहराम पहन लेता हूँ

मेरे घर वाले भी तकलीफ़ में आ जाते हैं
मैं जो कुछ देर को आराम पहन लेता हूँ

रात को ओढ़ के सो जाता हूँ दिन-भर की थकन
सुब्ह को फिर से कई काम पहन लेता हूँ

जब भी परदेस में याद आता है घर का नक़्शा
मैं तसव्वुर में दर-ओ-बाम पहन लेता हूँ

एक चाँदी की अँगूठी के हवाले से फ़क़त
अपनी उँगली में तिरा नाम पहन लेता हूँ

'फ़ैज़' यूँ रखता हूँ मैं उस की मोहब्बत का भरम
उस के हिस्से के भी इल्ज़ाम पहन लेता हूँ