उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bhang khate hain na ganja na charas pite hain

भंग खाते हैं न गाँजा न चरस पीते हैं

بھنگ کھاتے ہیں نہ گانجا نہ چرس پیتے ہیں

शायर: Faiz Khalilabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

भंग खाते हैं न गाँजा न चरस पीते हैं
हम वो भौंरे हैं जो एहसास का रस पीते हैं

आप इस ढंग से अमृत भी नहीं पी सकते
जिस हुनर-मंदी से हम अश्क-ए-नफ़स पीते हैं

सब यहीं छोड़ के जाना है ख़बर है लेकिन
फिर ये हम किस लिए दुनिया की हवस पीते हैं

जो तिरी याद के कीड़े हैं बदन के अंदर
वो मिरी रूह को खाते हैं प्लस पीते हैं

तब कहीं होता है इक शहद का छत्ता तय्यार
अन-गिनत फूलों का ख़ूँ जब ये मगस पीते हैं

आप इक बूँद भी पी लें तो ग़शी आ जाए
ग़म के आँसू जो असीरान-ए-क़फ़स पीते हैं

'फ़ैज़' की फ़िक्र की बोतल में है जो ज़हर-ए-सुख़न
देखना है की अभी कितने बरस पीते हैं