उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil mein gunja kiya ek naghma-e-tanhai bhi

दिल में गूँजा किया इक नग़्मा-ए-तन्हाई भी

دل میں گونجا کیا اک نغمۂ تنہائی بھی

शायर: Faiyyaz Bostan14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल में गूँजा किया इक नग़्मा-ए-तन्हाई भी
और उठाए फिरे हम बार-ए-शनासाई भी

तुम यक़ीं मत करो लेकिन मैं नहीं हूँ ज़िंदा
तुम को अच्छा है रहे ज़ो’म-ए-मसीहाई भी

अब तो शहज़ादी मिरे घर को बसाने आ जा
अब तो जंगों से पलट आए तिरे भाई भी

'इश्क़ करता है बसीरत का ज़ियाँ पहले-पहल
और फिर हौले से ले जाता है बीनाई भी

तुम मिरे पास रहो लाख सवालात करो
मैं तुम्हें प्यार भी देता हूँ पज़ीराई भी

मैं ने हर रंग में इक़रार किया है तेरा
सादगी भी तिरी महबूब है रा'नाई भी

तुझ को मा'लूम है सब सहन के इकलौते दरख़्त
तू मिरा यार भी है और मिरा भाई भी

इस से बढ़ कर नज़र-अंदाज़ कोई क्या होगा
वाक़ि'आ बन नहीं पाई मिरी रुस्वाई भी

मेरे होंटों से तू इस दर्जा सख़ावत न बरत
ये न हो छीन लें प्यासे तिरी रा'नाई भी

ख़ुद को किस तरह दिलाऊँगा यक़ीं सोचता हूँ
सोचता हूँ कि अगर वा'दे की शाम आई भी

लोग आ कर मिरी तन्हाई बढ़ा जाते हैं
जी का आज़ार है ये अंजुमन-आराई भी

फिर जगा देगा तिरा हाथ झटकना मुझ को
मुझ को बिल-फ़र्ज़ किसी तरह से नींद आई भी

ऐ मुझे देर से याद आए हुए मिसरा'-ए-वस्ल
छीन लूँगा मैं किसी दिन तिरी यकताई भी

वुस'अत-ए-कौन-ओ-मकाँ हब्स-कदा है उस को
रास आए न जिसे बाँहों की गीराई भी