उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahaar rut mein KHizan jhel kar KHarab hue

बहार रुत में ख़िज़ाँ झेल कर ख़राब हुए

بہار رت میں خزاں جھیل کر خراب ہوئے

शायर: Faiyyaz Bostan13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बहार रुत में ख़िज़ाँ झेल कर ख़राब हुए
हिम अपने घर हुए तुम अपने घर ख़राब हुए

खिला रहेगा हमेशा वो आइना-चेहरा
जवाँ गुलाब जसे देख कर ख़राब हुए

तुझे बनाने की कोशिश मैं ऐ सुनहरे चराग़
सितारे ख़ाक हुए कूज़ा-गर ख़राब हुए

मैं बे-ज़रर हूँ मुझे छूने दे बदन अपना
तिरे नुक़ूश अगर रत्ती भर ख़राब हुए

दिल एक दन तिरी दीवार पर नहीं बैठा
पए ग़ुरूर मिरे बाल-ओ-पर ख़राब हुए

अगर ये फूल तिरी राह तक नहीं पहुँचे
अगर ये फूल मरी ख़ाक पर ख़राब हुए

किसी किसी को ये दिल दश्त ले कर आता है
वगर्ना बेशतर अपने ही घर ख़राब हुए

बहुत से मेरी तरह तेरा ख़्वाब देखते थे
मगर जो मैरी तरह सर-ब-सर ख़राब हुए

तुझे तो दस्त-ए-हुनर नंग-ए-आफ़रीनश हैं
पड़े पड़े जू बदन चॉक पर ख़राब हुए

जहान वाले हमारी मिसाल देते हैं
तो आप सोचिए हम कस क़दर ख़राब हुए

हमें ख़राबी से या'नी दिली त'अल्लुक़ था
हुए ख़राब तो बार-ए-दिगर ख़राब हुए

अँगूठी आख़िरश इक क़िस्सा-गो के हाथ आई
फिर उस कहानी में सब सेहर-गर ख़राब हुए

सुना है उन दिनों इक जंग-जू का दिल टूटा
फिर उस के बा'द हज़ारों नगर ख़राब हुए