उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne uslub se bahar to nahin aaenge

अपने उस्लूब से बाहर तो नहीं आएँगे

اپنے اسلوب سے باہر تو نہیں آئیں گے

शायर: Faiyyaz Bostan8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने उस्लूब से बाहर तो नहीं आएँगे
ये सफ़र-ज़ाद हैं ये घर तो नहीं आएँगे

मसअला ये है तू यक-बारगी खिलता भी नहीं
हम भी ख़ुद-सर हैं मुकर्रर तो नहीं आएँगे

जिस्म ले आएँगे पर दिल तो नहीं आएगा
हम तिरे पहलू से यकसर तो नहीं आएँगे

मिलने आया है तू और बाहमी फ़ुर्सत है हमें
दिन अब इस दिन से भी बेहतर तो नहीं आएँगे

एक इक कर के सभी यार बड़े हो गए हैं
अब वो मुझ कम के बराबर तो नहीं आएँगे

ख़ूब-रू ख़ाना-बदोशों का भरम भी रख ले
ये हमेशा तिरे दर पर तो नहीं आएँगे

सग-बरदारों के संग आए हो तुम मस्लहतन
या'नी उस सम्त से पत्थर तो नहीं आएँगे

तेरे आने से है मशरूत मिरी ख़ुश-बख़्ती
भले दिन मेरे कहे पर तो नहीं आएँगे