उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajnabi hai wo magar yar bhi lagta hai mujhe

अजनबी है वो मगर यार भी लगता है मुझे

اجنبی ہے وہ مگر یار بھی لگتا ہے مجھے

शायर: Faiyyaz Bostan10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजनबी है वो मगर यार भी लगता है मुझे
एक दरवाज़ा जो दीवार भी लगता है मुझे

मुद्दतों में भी नहीं लगता कभी ज़ख़्म-ए-गुरेज़
और इक शब में कई बार भी लगता है मुझे

नज़र-अंदाज़ भी कर देता है वो शख़्स कभी
अपना होना कभी बे-कार भी लगता है मुझे

जितनी दिलचस्पी दिखाता है मसीहा मेरा
थोड़ा थोड़ा मिरा बीमार भी लगता है मुझे

लोग जो तेरा बुरा चाहते हैं शहज़ादी
उन में से इक तिरा सालार भी लगता है मुझे

शाहज़ादी मुझे लगता है दिलासा तेरा
शाहज़ादी तिरा रुख़्सार भी लगता है मुझे

अपने जज़्बात छुपाने पे भी शर्मिंदा हूँ
और झूटा तिरा 'इनकार' भी लगता है मुझे

बात यूँ है वो मिरा मरहम-ए-तन्हाई है
वो भले दरपय-ए-आज़ार भी लगता है मुझे

कभी महज़ आँखें बिछा लेता हूँ तेरी रह में
और कभी कम मिरा घर-बार भी लगता है मुझे

तेरा इन हालों मिरे साथ गुज़ारा करना
'इश्क़ भी लगता है ईसार भी लगता है मुझे