उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dimak tere firaq ki khati rahi mujhe

दीमक तेरे फ़िराक़ की खाती रही मुझे

دیمک تیرے فراق کی کھاتی رہی مجھے

शायर: Lankesh Gautam7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दीमक तेरे फ़िराक़ की खाती रही मुझे
रह रह के तेरी याद सताती रही मुझे

मैं दश्त हो गया था उसे सोच सोच कर
वो भी समझ के ख़ाक उड़ाती रही मुझे

उस की तलब ही से मैं गया ख़ुद-कुशी की सम्त
जो ज़िंदगी के घूँट पिलाती रही मुझे

ग़र्क़ाब हो चुका था मैं दरिया की कोख में
आ आ के कोई मौज उठाती रही मुझे

वर्ना तो सर्द रात में बुझ ही गया था मैं
कोई हवा-ए-तेज़ जलाती रही मुझे

वो फ़िक्र मारकीज़ की रेमेडियोस थी
ख़ल्वत के सौ सौ साल जगाती रही मुझे

हाए वो तेरी आग से बचने की कोशिशें
किन आतिशों में घेर के लाती रही मुझे