उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baghair zewaron ke bhi hasin hai yaqin hai

बग़ैर ज़ेवरों के भी हसीन है यक़ीन है

بغیر زیوروں کے بھی حسین ہے یقین ہے

शायर: Lankesh Gautam7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बग़ैर ज़ेवरों के भी हसीन है यक़ीन है
वफ़ा जो ओढ़ ले वो नाज़नीन है यक़ीन है

परिंदगी में इस तरह से छू रहा हूँ आसमाँ
कि आसमाँ भी अब मिरी ज़मीन है यक़ीन है

इसी लिए वो पूछती है प्यार पर यक़ीं है क्या
मैं ना-मुराद बोल दूँ यक़ीन है यक़ीन है

अगर तुम्हारे नक़्श-ए-पा मिलें वफ़ा की राह पर
तवील रास्ता भी ख़ुश-तरीन है यक़ीन है

उसे ये लग रहा है फिर शराब पी गई मुझे
वो दो दिखा के पूछता है तीन है यक़ीन है

तिरी सदा की धुन पे झूमता रहूँगा 'उम्र भर
मैं नाग हूँ तिरा कलाम बीन है यक़ीन है

गो मुझ को मौलवी बता रहा था ये हराम है
मगर तू कह रहा है इस में दीन है यक़ीन है